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वीर रस में प्रेम पचीसी

वीर रस में प्रेम पचीसी
मजाक का लहज़ा, और इतनी गहराई के साथ अभिव्यक्ति, मान गये आपकी लेखनी का लोहा, कुछ तो उधार दे दो, अनूप भाई, ब्याज चाहे जो ले लो.
सच में हम पढ़कर बहुत शरमाये। लाल से हो गये। सच्चाई तो यह है कि हर लेख को पोस्ट करने के पहले तथा बाद तमाम कमियां नज़र आतीं हैं। लेकिन पोस्ट करने की हड़बड़ी तथा बाद में आलस्य के चलते किसी सुधार की कोई संभावना नहीं बन पाती।
अपनी हर पोस्ट लिखने के पहले (डर के मारे प्रार्थना करते हुये)मैं नंदनजी का शेर दोहराता हूं:-
मैं कोई बात तो कह लूं कभी करीने से
खुदारा मेरे मुकद्दर में वो हुनर कर दे।

जबसे रविरतलामीजी ने बताया कि हम सब लोग कूडा़ परोसते हैं तबसे यह डर ‘अउर’ बढ़ गया। हालांकि रविजी ने पिछली पोस्ट की एक लाइन की तारीफ की थी लेकिन वह हमारी नहीं थी लिहाजा हम उनकी तारीफ के गुनहगार नहीं हुये।
बहुत दिनों से ई-कविता तथा ब्लागजगत में कविता की खेती देखकर हमारे मन में भी कुछ कविता की फसलें कुलबुला रहीं थीं। यह सोचा भी था कि हिंदी ब्लाग जगत तथा ई-कविता की भावभूमि,विषय-वस्तु पर कुछ लेख लिखा जाय ।सोचा तो यह भी था कि ब्लागरों की मन:स्थिति का जायजा लिया जाय कि क…
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सोमवार, १४ मार्च २०११हमारा महानगर पतनगाथा अनामी शरण बबल ये है मुंबई नगरिया तू देख बबूआ। मुबंई का जादू भले ही पूरे देश में चल जाए, मगर दिल्ली में सब का जादू उतर ही जाता है। पूर्वी उतरप्रदेश के किसी एक शहर से सामान्य लेबर की तरह मुबंई में जाकर सिनेमाई कामयाबी पाने वाले हमारा महानगर के मालिक आर एन सिंह आज मुबंई की धड़कन है। एक सिक्योरिटी कंपनी खोलकर हर माह करोड़ों रूपए की खाटा आमदनी कमाने वाले सिंह साहब की जेब में लाखों पूरबिया वोट का जादू है। यही वजह है कि शिवसेना से लेकर महाराष्ट्र का कोई भी मुख्यमंत्री आर. एन सिंह को हर तरह से अपने काबू में रखना चाहता है। हमारा महानगर के मालिकों के इसी जादू का असर है कि मुबंई में यह अखबार चल नहीं दौड़ रहा है। लाखों की प्रसार वाले इस अखबार को पूर्वी यूपी का दर्पण बना दिया गया है। मुबंई में बैठा हर पूरबिए के लिए यह अखबार रोजाना की जरूरतों में शामिल हो गया ह। यही वजह है कि सामान्य मजदूर की तरह आज से 40-45 साल पहले मुबंई गए सिंह को यह शहर इस कदर भाया कि वे अपने पोलिटिकल संपर्को के चलते मुबंई के मेयर बनने का सपना भी साकार किया। अखबार की कमाई को और बढ़ाने में…

मीडिया / मल्टी एडीशन युग की वापसी के खतरे

मल्टी एडीशन युग की वापसी के खतरे
अनामी शरण बबल पिछले कई सालों से खबरिया और मनोरंजन चैनलों के अलावा धार्मिक चैनलों और क्षेत्रीय या लोकल खबरिया चैनलों का बढ़ता जलवा फिलहाल थम सा गया दिख रहा है। हालांकि अगले छह माह के दौरान कमसे कम एक दर्जन चैनलों की योजना प्रसवाधीन है। इन खबरिया चैनलों की वजह से खासकर हिन्दी के अखबारों के मल्टी एडीशन खुमार थोड़ा खामोश सा दिखने लगा था। खासकर एक दूसरे से आगे निकलने के कंपीटिशन में लगे दैनिक भास्कर, अमर उजाला और दैनिक जागरण का मल्टी एडीशन कंपीटिशन फिलहाल थमा हुआ है। अलबता, दैनिक हिन्दुस्तान का मल्टी एडीशन कल्चर इस समय परवान पर है। इस समय थोडा अनजाना नाम होने के बावजूद बीपीएन टाईम्स, और स्वाभिमान टाईम्स का एक ही साथ दो तीन माह के भीतर एक दर्जन से भी ज्यादा शहरों से प्रकाशन की योजना हैरानी के बावजूद स्वागत योग्य है। इनकी भारी भारी भरकम योजना निसंदेह पत्रकारों और प्रिंट मीडिया के लिए काफी सुखद है। उतर भारत के खासकर हरियाणा, पंजाब इलाके में पिछले दो साल के दौरान आज समाज ने भी आठ दस एडीशन चालू करके हिन्दी प्रिंट मीडिया को नया बल प्रदान किया है। हिन्दी में मल्टी एड…