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इस्मत चुग़ताई की कहानी---- भाभी

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भाभी ब्याह कर आई थी तो मुश्किल से पंद्रह बरस की होगी।बढवार भी तो पूरी नहीं हुई थी। भैया की सूरत से ऐसी लरजती थी जैसे कसाई से बकरी। मगर सालभर के अंदर ही वो जैसे मुँह-बंद कली से खिलकर फूल बन गई। ऑंखों में हिरनों जैसी वहशत दूर होकर गरूर और शरारत भर गई।
भाभी आजाद फिजाँ में पली थी। हिरनियों की तरह कुलाँचें भरने की आदी थी, मगर ससुराल और मैका दोनों तरफ से उस पर कडी निगरानी थी और भैया की भी यही कोशिश थी कि अगर जल्दी से उसे पक्की गृहस्थन न बना दिया गया तो वो भी अपनी बडी बहन की तरह कोई गुल खिलाएगी। हालाँकि वो शादीशुदा थी। लिहाजा उसे गृहस्थन बनाने पर जुट गए।
चार-पाँच साल के अंदर भाभी को घिसघिसा कर वाकई सबने गृहस्थन बना दिया। दो-तीन बच्चों की माँ बनकर भद्दी और ठुस्स हो गई। अम्मा उसे खूब मुर्गी का शोरबा, गोंद सटूरे खिलातीं। भैया टॉनिक पिलाते और हर बच्चे के बाद वो दस-पंद्रह पौंड बढ जाती।
आहिस्ता-आहिस्ता उसने …

“दाग न लगने देंगे भगत सिंह की शहादत पर…” *

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Get Shareaholic for Firefox ।। धीरज भारद्वाज ।।
भगत सिंह की शहादत का मजाक बनाना शायद सरकार के लिए आसान नहीं रह गया। दिल्ली ही नहीं, देश भर में शहीद-ए-आज़म के खिलाफ अदालत में गवाही देने वाले गद्दार शोभा सिंह के खिलाफ लोग एकजुट होने लगे हैं। पंजाब के कई नेताओं ने धमकी दी है कि अगर जल्दी ही सरकार ने अपना फैसला वापस नहीं लिया तो वे सड़क पर आंदोलन करने को मजबूर होंगे।

तीक्ष्ण सूद पंजाब के वरिष्ठ भाजपा नेता तीक्ष्ण सूद ने कहा है कि विंडसर प्लेस का नाम शोभा सिंह के नाम पर करने का दिल्ली सरकार का यह फैसला करोड़ों देशभक्तों का अपमान है। सूद के मुताबिक पंजाब की जनता दिल्ली सरकार के इस फैसले को किसी हाल में लागू नहीं होने देगी। उन्होंने मीडिया दरबार को बताया कि अगर जरूरत पड़ी तो भगत सिंह के समर्थक ट्रकों में भर कर दिल्ली आ जाएंगे और संसद का घेराव करेंगे।

भगत सिंह क्रांति सेना के सदस्यइधर दिल्ली में भगत सिंह क्रांति सेना ने सभी कॉलेजों में जागरुकता अभियान चलाने का फैसला किया है। सेना के अध्यक्ष ताजिंदर पाल सिंह बग्गा के मुताबिक इस अभियान के तहत दिल्ली भर के कॉलेजों में पोस्टर बांट…

शिवनाथ झा ला रहे हैं शहीदों के भूले-बिसरे वंशजों पर फिल्म

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Get Shareaholic for Firefox 1857 में हुए भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक तात्यां टोपे और जलियांवाला बाग कांड का बदला लेने वाले शहीद-ए-आज़म उधम सिंह का नाम तो आज भी देश भर में बच्चे-बच्चे की जुबान पर है, लेकिन आजादी के लिए अपने तन-मन-धन का बलिदान कर देने वाले इन शहीदों के वंशज़ आज किस बदहाली में अपना जीवन गुजार रहे हैं, यह किसी ने सोचा तक नहीं है। करीब एक सदी तक चले स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे अनेकों क्रान्तिकारी थे जिनके परिवारवालों और वंशजों को किसी ने याद नहीं रखा। इन भूले-बिसरे परिजनों और वंशजों की बदहाली को मशहूर पत्रकार शिवनाथ झा एक फीचर फिल्म के माध्यम से बयां करने की तैयारी में हैं।
झा के मुताबिक “डिस्ग्रेसफुल” (अपमानजनक) नाम की इस फिल्म के माध्यम से भारत को आजादी दिलाने वाले ऐसे शहीदों, महापुरुषों और क्रान्तिकारियों के 30 वंशजों से बातचीत के आधार पर उन परिवारों की मौजूदा दुर्दशा को झलकाने का प्रयास किया जाएगा जिनके पुरखो ने 1857 से 1947 तक चले स्वतंत्रता संग्राम में अपना जीवन न्यौछावर कर दिया। शिवनाथ झा ने मीडिया दरबार को बताया कि उन्होंने इस फिल्म की य…

स्वामी विवेकानंद का संदेश किसे याद है

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रवींद्र नाथ टैगोर का 150वां जन्मदिन मनाने के बाद अब बारी है स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन मनाने की. दोनों बंगाल के थे, लेकिन भारत के संदर्भ में दोनों का विजन का़फी अलग था. शिकागो में हुई विश्व धर्म संसद में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के बाद विवेकानंद का़फी प्रसिद्ध हो गए. कदाचित वह आधुनिक भारत के पहले व्यक्ति थे, जिन्हें वैश्विक प्रसिद्धि प्राप्त हुई थी. वह न केवल अच्छे वक्ता थे, बल्कि अच्छे रूप-रंग, अच्छी आवाज़ और गेरुआ वस्त्र के कारण पवित्र इंसान भी दिखते थे. अब यही गेरुआ वस्त्र स्वामियों की पोशाक बन गया है. दूसरी ओर टैगोर ब्रह्म समाज की परंपरा में पले थे. भारतीय रहस्यवाद के माध्यम से विश्व को एशिया का संदेश देकर उन्होंने भी अंग्रेजी समाज पर चोट की, लेकिन उनका धर्म वैश्विक था. सबसे बड़ी बात है कि वह संत नहीं थे, लेकिन टैगोर एक महान उपन्यासकार, नाटककार, कहानीकार, चित्रकार एवं संगीतकार थे.
20वीं सदी के मध्य में राजनीतिक हिंदूवाद रूढ़िवादी हो गया और जातिवाद की समाप्ति, जिसे सुधार का मुख्य आधार होना चाहिए था, को ऐसे ही छोड़ दिया गया. हम लोग अभी तक इसकी क़ीमत चुका रहे हैं. हर द…

शिखर पर तथागत अवतार तुलसी( tathagat avtar tulsi)

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Tue Jul 13 2010 18:25:16 GMT+0530 (India Standard Time) बाइस वर्ष के तथागत अवतार तुलसी की उपलब्धियां किसी करिश्मे से कम नहीं हैं। जिस उम्र में हमारे देश के बच्चे आम तौर पर अपनी पढ़ाई पूरी करने में लगे होते हैं और रोजी-रोजगार के लिए सोचना शुरू करते हैं,उस उम्र में तथागत ने लाखों स्टूडेंट्स को दिशा दिखाने का जिम्मेदारी भरा काम संभाल लिया है। वह आईआईटी मुंबई में फिजिक्स पढ़ाने जा रहा है। इस तरह वह देश का सबसे कम उम्र का प्रोफेसर बन गया है।

पटना में पैदा हुए तथागत ने मात्र 9 साल की उम्र में दसवीं, 12 साल की उम्र में बीएससी और 13 साल की उम्र में एमएससी की परीक्षा पास की। फिर उसने 21 वर्ष की उम्र में क्वांटम कंप्यूटरिंग में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस से पीएचडी की डिग्री हासिल की। लेकिन तथागत की एक उपलब्धि शायद इन सब से ज्यादा है। उसने कनाडा की एक यूनिवर्सिटी का आकर्षक ऑफर ठुकरा कर और भारत में काम करने का निर्णय कर देशवासियों का दिल जीत लिया। उसने साबित किया कि उसके पास भौतिकी और गणित के जटिल सवालों से टकराने की सूझ के साथ-साथ व्यापक सामाजिक दृष्टि भी है। वह अपने देश में रहकर …

तथागत तुलसी का तेज दिमाग प्रोग्रामिंग का नतीजा है

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[ Posted On Fri 23 Jul 10, 8 : 45 AM] मुंबई, 12 साल में एमएससी, 21 साल में पीचएडी और 22 साल में प्रोफेसरी करने वाले तथागत अवतार तुलसी के बारे में कहना है कि उनका तेज दिमाग ‘प्रोग्रामिंग’ की देन है। ऐसा उनके पिता प्रोफेसर तुलसी नारायण का दावा है। वह यहां तक कहते हैं कि कोई भी इस तरह की ‘प्रोग्रामिंग’ कर जीनियस दिमाग वाला बच्‍चा पा सकता है। तथागत अवतार तुलसी के माता-पिता के चेहरे पर तब मुस्कान बिखर गई थी जब उनके बेटे को 2003 में दुनिया सात सबसे प्रतिभाशाली युवाओं में शामिल किया गया था। हालांकि तुलसी के माता-पिता ने उसके जन्म से पहले ही यह तय कर लिया था कि तुलसी जीनियस होगा।
अगर तथागत के परिजनों के दावों में दम है तो आज के ज़माने में तुलसी को प्रोग्राम्ड चाइल्ड कहा जाएगा। मूल रूप से बिहार के रहने वाले तथागत अवतार तुलसी के पिता प्रोफेसर तुलसी नारायण प्रसाद सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं। और वे ज्योतिषीय-अनुवांशिकी (एस्ट्रो-जेनेटिक्स) में गहरा यकीन रखते हैं। लेकिन उनका दावा है कि कुछ दशक पहले जब उन्होंने यह कहा था कि जन्म लेने वाले बच्चे का लिंग निर्धारित किया जा…

रचनात्मक ऊर्जा से भरपूर हैं खुशवंत सिंह: महेश भट्ट

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विवादों में रहने वाले लेखक खुशवंत सिंह अपनी साफगोई और बेखौफ फितरत के लिए जाने जाते हैं। अंग्रेजी-हिंदी में समान रूप से पढे जाने वाले खुशवंत 94 की उम्र में भी युवा ऊर्जा एवं रचनात्मकता से भरपूर हैं। हमेशा कुछ न कुछ करते रहना इन्हें अच्छा लगता है। यूं तो इनकी जिंदगी एक खुली किताब की तरह रही है, लेकिन इनके जीवन के कुछ ऐसे पहलू भी हैं, जो पूरी तरह दुनिया के सामने नहीं आए। इनके व्यक्तित्व के चंद पहलुओं पर रोशनी डाल रहे हैं निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट।
हमारी सभ्यता मुनाफेपर चलती है। समाज में उसी की इज्जत व शोहरत होती है, जो मुनाफा ला सके। इसलिए जब कोई वृद्ध मुनाफे में सहायक नहीं होता तो उसे इतिहास के डस्टबिन में डाल कर समाज भूल जाता है। इसी कारण मानव सभ्यता के आरंभिक काल से जीवन के अंतिम 15-20 वर्षो के प्रति लोग डरे रहते हैं। माना जाता है कि जीवन के अंतिम वर्षो में हमारे दिल-ओ-दिमाग में क्रिएटिविटी की धधकती आग बुझने लगती है। रचनाकारों की वास्तविक मौत से पहले सृजनात्मक मौत हो जाती है। यह बात ज्यादातर लोगों के बारे में सच हो सकती है, लेकिन एक व्यक्ति ने इसे झुठला दिया है। उनका…

सेक्सी सरदार-ख़तरनाक 'सेक्सुअल टेरेरिस्ट' हैं खुशवंत सिंह

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अतुल अग्रवालअतुल अग्रवाल और खुशवंत सिंह का बहुत गहरा नाता होता जा रहा है,जहा एक जाना जाता है फालतू की बकबास और अश्लीलता के लिए तो दूसरा जाना जाता है उसके विरोध के लिए.जी हाँ हम बात कर रहे है अतुल अग्रवाल जी की जिन्होंने खुशवंत सिंह के गैर सामाजिक लेखों का एक सटीक शैली में विरोध किया था..तो आपके सामने एक बार फिर हाजिर है उसी सटीकता के साथ लिखा गया एक और लेख इस मुद्दे पर आप अपनी राय दे सकते है की क्या सच में खुशवंत सिंह कुछ अच्छा काम कर रहा है या फिर अतुल अग्रवाल का विरोध करना नाजायज है?आकी राय को प्रकाशित किया जायेगा!

मशहूर लेखक खुशवंत सिंह सुधर नहीं सकते। अब मुझे इसका यकीन हो चला है। कहते हैं उम्र के आखिरी पड़ाव में इंसान भगवान को याद करता है और पूजा-पाठ तथा ईश-भक्ति कर अपने पापों के लिए क्षमा मांगता है ताकि उसका परलोक सुधर सके। लेकिन यहां तो उल्टी ही गंगा बह रही है। क्षमा मांगने की तो छोड़िए जनाब, पाप पर पाप किए जाने की लत लगातार बदतर होती जा रही है। दिन-ब-दिन वयोवृद्ध लेखक की ठरक नई-नई हदें बनाती और लांघती जा रही है। ऐसा लग रहा है कि 93 साल की …

गद्दारी को ये कैसा सम्मान

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पत्रकारिता - जनसंचार बुधवार, २७ जुलाई २०११
खुशवंत सिंह के पिता ने दिलवाई थी भगत सिंह को फांसी: दिल्ली सरकार देगी ‘सम्मान 0
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शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की एक दुर्लभ तस्वीर
शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के बलिदान को शायद ही कोई भुला सकता है। आज भी देश का बच्चा-बच्चा उनका नाम इज्जत और फख्र के साथ लेता है, लेकिन दिल्ली सरकार उन के खिलाफ गवाही देने वाले एक भारतीय को मरणोपरांत ऐसा सम्मान देने की तैयारी में है जिससे उसे सदियों नहीं भुलाया जा सकेगा। यह शख्स कोई और नहीं, बल्कि औरतों के विषय में भौंडा लेखन कर शोहरत हासिल करने वाले लेखक खुशवंत सिंह का पिता ‘सर’ शोभा सिंह है और दिल्ली सरकार विंडसर प्लेस का नाम उसके नाम पर करने का प्रस्ताव ला रही है।

भगत सिंह का घर
भारत की आजादी के इतिहास को जिन अमर शहीदों के रक्त से लिखा गया है, जिन शूरवीरों के बलिदान ने भारतीय जन-मानस को सर्वाधिक उद्वेलित किया है, जिन्होंने अपनी रणनीति से साम्राज्यवादियों को लोहे के चने चबवाए हैं, जिन्होंने परतन्त्रता की बेड़ियों को छिन्न-भिन्न कर स्वतंत्रता का मार्ग…