संदेश

August, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

साहित्य

मुखपृष्ठ भारत डिस्कवरी प्रस्तुति

हिन्दी साहित्य की जड़ें मध्ययुगीन भारत की ब्रजभाषा, अवधी, मैथिली और मारवाड़ी जैसी भाषाओं के साहित्य में पाई जाती हैं। * प्राचीन युग के लेखकों और कवियों की विशेष रुचि यात्रावर्णन तथा रोचक कहानी कहने में थी। * भारतकोश पर लेखों की संख्या प्रतिदिन बढ़ती रहती है जो आप देख रहे वह "प्रारम्भ मात्र" ही है... विशेष आलेख कबीर कबीरदास * कबीर भक्ति आन्दोलन के एक उच्च कोटि के कवि, समाज सुधारक एवं संत माने जाते हैं। संत कबीर दास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के इकलौते ऐसे कवि हैं, जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करते रहे। * कबीरदास कर्म प्रधान समाज के पैरोकार थे और इसकी झलक उनकी रचनाओं में साफ झलकती है। कबीर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनकी प्रतिभा में अबाध गति और अदम्य प्रखरता थी। * समाज में कबीर को जागरण युग का अग्रदूत कहा जाता है। डॉ. हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि साधना के क्षेत्र में वे युग -युग के गुरु थे, उन्होंने संत काव्य का पथ प्रदर्शन कर साहित्य क्षेत्र में नव निर्माण किया था। * कबीरदास न…

उपनाम / क्या रका है नाम उपनाम में

पूरे विश्व में यह वाक्य प्रचलित है, 'नाम में क्या रखा है।' सही भी है कि नाम में क्या रखा है। नाम तो कुछ भी हो सकता है, लेकिन उपनाम में सचमुच में ही कुछ न कुछ है तभी तो भाषाविदों के नेतृत्व में ब्रिटेन के ब्रिस्टल स्‍थित पश्चिमी इंग्लैंड युनिवर्सिटी (UWE) उपनामों पर शोध के लिए लाखों पॉउंड खर्च कर रही है।

उपनामों पर शोध करके उनके पीछे के इतिहास को सार्वजनिक किया जाएगा और यह भी की उपनामों के इस डाटा को सर्चेबल सॉफ्टवेयर में डालकर सुरक्षित रखा जाएगा। उपनाम को अंग्रेजी में सरनेम (surname) कहा जाता है।

अब जब हम ब्रिटिश नागरिक की बात करते हैं जो उनमें वे भारतीय भी शामिल होते हैं जिनके पूर्वज कई वर्षों पूर्व ही ब्रिटेन में जाकर बस गए थे और जिनकी पीढ़ियाँ अब पूरी तरह से ब्रिटिश हैं। इन भारतीय ब्रिटिश नागरिकों के उपनामों पर भी शोध होगा, जिनमें शामिल है पटेल, सिंह, अहमद और स्मिथ।

भारत में तो उपनामों का समंदर है। अनगिनत उपनाम जिन्हें लिखते-लिखते शायद सुबह से शाम हो जाए। यदि उपनामों पर शोध करने लगे तो कई ऐसे उपनाम है जो हिंदू समाज के चारों वर्णों में एक जैसे पाए जाते हैं। दरअसल भारतीय उपनाम क…

दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात-दिन

चित्र

हेमंत शेष

हेमंत शेष

 हेमंत शेष हेमंत शेष हिन्दी के सुपरिचित कवि, सम्पादक, कला-आलोचक, छायाकार, स्तम्भकार, चित्रकार, फिल्म-निर्माता एवं प्रशासक हैं । उनका जन्म प्रख्यात सांस्कृतिक प्रवासी आंध्र-परिवार में, (जो जयपुर और बीकानेर के तांत्रिक राजगुरुओं का परिवार रहा है), 28 दिसम्बर, 1952 को जयपुर (राजस्थान, भारत) में हुआ । उन्होंने एम.ए.(समाजशास्त्र) राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर से 1976 में किया और तुरंत बाद ही वह प्रशासनिक सेवा में चयनित कर लिए गए । प्रतापगढ़, राजस्थान में कलेक्टर पद पर कार्य कर चुके हेमन्त शेष राजस्थान राजस्व मंडल, अजमेर रजिस्ट्रार पद पर हैं। अनुक्रम [छुपाएँ] * 1 प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें * 2 यंत्रस्थ-पुस्तकें: * 3 सम्पादित पत्रिकाएं: * 4 सांस्कृतिक और अन्य स्वैच्छिक संस्थाओं से सम्बद्धता: * 5 कला एवं साहित्यिक सम्बंधी अन्य उपलब्धियां:[2] * 6 प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान: * 7 परिचय विश्वकोशों में शामिल : * 8 सन्दर्भ * 9 स्रोत * 10 बाहरी कड़ियाँ [संपादित करें] प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें हेमंत शेष की प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें निम्नलिखित हैं:[1]…

हिन्‍दी साहित्‍य के इतिहास में पत्र-पत्रिकाओं की प्रासंगिकता एवं उपादेयता

चित्र
वीरेन्द्र सिंह यादव 
ज्ञान मानव को अन्‍तर्दृष्‍टि देता है, वह व्‍यक्‍ति या समाज में परिवर्तन का वाहक बनता है। पत्र-पत्रिकाएँ ज्ञान का भंडार होती हैं, इसलिए परिवर्तन में उनकी भूमिका महत्‍वपूर्ण होती है लगभग सभी धर्म उनके सहारे ही फैले हैं। बड़ी-बड़ी सामाजिक क्रांतियां भी पत्र-पत्रिकाओं ने ही करवायी है। व्‍यक्‍ति के जीवन में पत्र-पत्रिकाएँ अति महत्‍वपूर्ण परिवर्तन लाती हैं। क्‍योंकि इससे उपयोगी जानकारी करके व्‍यक्‍ति अधिक योग्‍य और जीवनयापन के लायक बन जाता है। यह सच है कि इनके पढ़ने से व्‍यक्‍तित्‍व का विकास होता है सिर्फ इसलिए नहीं कि पढ़ने वाले का ज्ञान बढ़ता है, बल्‍कि इसलिए भी कि पत्र-पत्रिकाओं में व्‍यक्‍तित्‍व निखार के नुस्‍खे मिल जाते हैं। पाश्‍चात्‍य देशों में तो व्‍यक्‍ति को आकर्षक बनाने के गुर सिखाने वाली पत्रिकाओं का अंबार सा मिलता है।
साहित्‍यिक पत्र-पत्रिकाएँ सामाजिक व्‍यवस्‍था के लिए चतुर्थ स्‍तम्‍भ का कार्य करती हैं और अपनी बात को मनवाने के लिए एवं अपने पक्ष में साफ-सुथरा वातावरण तैयार करने में पत्र-पत्रिकाओं ने सदैव अमोघ अस्‍त्र का कार्य किया है। अमानवीय व्‍यवहार, अन्‍…