संदेश

September, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भूल गए राधाकृष्ण को

चित्र
संजय कृष्ण :  राधाकृष्ण को हमारे हिंदी लेखकों ने उनकी जन्मशताब्दी पर भी याद नहीं किया। जाहिर है, वे किसी ऐसे गुट के नहीं थे, जो उन्हें याद करता। हिंदी साहित्य जगत में गुटबाजी का ऐसा आलम है कि हम उन्हें याद भी नहीं करते, न जन्म तिथि पर पुण्य तिथि पर। वे ऐसे कथाकार थे, जिन्हें प्रेमचंद पुत्र की तरह प्रेम करते थे, गुरबत के दिनों में उनका खर्च चलाते थे और जब प्रेमचंद का निधन हुआ तो राधाकृष्ण 'हंसÓ को संभालने रांची से बनारस चले गए थे। इनकी कथा-प्रतिभा को देखकर प्रेमचंद ने कहा था 'यदि हिंदी के उत्कृष्ट कथा-शिल्पियों की संख्या काट-छांटकर पांच भी कर दी जाए तो उनमें एक नाम राधाकृष्ण का होगा।Ó
  राधाकृष्ण का जन्म रांची के अपर बाजार में 18 सितंबर 1910 को हुआ था और निधन 3 फरवरी 1979 को। उनके पिता मुंशी रामजतन मुहर्रिरी करते थे। उनकी छह पुत्रियां थीं और एक पुत्र राधाकृष्ण, जो बहुत बाद में हुए। पर, राधाकृष्ण के साथ यह क्रम उलट गया यानी राधाकृष्ण को पांच पुत्र हुए व एक पुत्र। राधाकृष्ण जब चार साल की उम्र के थे तो उनके पिता का निधन हो गया। 1942 में इनकी शादी हुई। उनके निधन के सत्रह साल बाद उन…

रांची / किसी आईने की तलाश में रांची / [संजय कृष्ण]।

चित्र
किसी आईने की तलाश में रांची [संजय कृष्ण]।
 मुंशी प्रेमचंद के सहयोगी रहे व्यंग्य कथा सम्राट राधाकृष्ण के शहर रांची में साहित्यिक तापमान- सूचक कांटा बेशक ऊपर-नीचे होता रहता है किन्तु यह कभी शून्य तक नहीं गिरता। ताजा सरगर्म कथा के अनुसार इंदु जी की दुकान से ही यह खबर फूटी कि रणेंद्र ने महुआ माजी के प्रतीक्षित नवीनतम उपन्यास मरंग गोडा नीलकंठ हुआ की निर्मम शल्य क्रिया कर दी है। समीक्षा छपने से पहले ही कलमघिस्सुओं ने चटखारे ले-लेकर उपन्यास का पोस्टमार्टम शुरू कर दिया। मई में ही चर्चा आम हो गयी थी कि समीक्षा नया ज्ञानोदय में आ रही है। समीक्षा पढने के लिए लोग आकुल- व्याकुल होने लगे। जैसे ही जून चढा, हर रोज लोग इंदु जी दुकान पर हाजिरी लगाते, पत्रिका आई क्या? इंदुजी भी रोज सुबह रेलवे स्टेशन जाते, पता करते और फिर उदास हो चले आते। पाठक- साहित्यकार दोनों बेसब्र हो रहे थे। खैर, आधा महीना गुजर जाने के बाद आखिरकार जून का अंक आया। रणेंद्र की समीक्षा सबने देखी-सबने पढी। वरिष्ठ लोगों की प्रतिक्रिया होती, बतिया त ठीके लिखे हैं। और आहत महुआ ने ज्ञानोदय को लंबी प्रतिक्रिया भेज दी। उदारता दिखाते हुए रवींद्र …

यक्ष - प्रशन / भोलानाथ त्यागी

कविता /


कोयल की कूक / और -
कोयला की दलाली में ,
...
मची , संसदीय हूक -
इसका कोई समीकरण नहीं बनता ,
लेकिन , राजनीति जब सुलगती है -
तो उसकी परिणिती बुझते कोयला मे ,
परिवर्तित हो जाती है ,
और यह कोयला फिर , खदानों में -
जा छिपता है ,
जिसके ऊपर उगे जंगल में -
कोयल जब कूकती है / तो -
लगता है / मानो संसद में हंगामा चल रहा है ,
और राजनीती की खदान में -
सिर्फ निकलती है - कालिमा ,
जिसमे सभी के हाथ , रंगें होतें हैं ,
मुखिया का रोबोटी चेहरा -
किसी सिकलीगर की याद दिला देता है ,
जो , सुधारता है ताले -
बनाता है तालियाँ -
राज ( ? ) कोष हेतु ,
कभी - कभी , हथियार बनाता भी ,
पाया जाता है , सिकलीगर -
जिससे , पनपते हैं अपराध / समाज , राजनीति में ,
और जब ,
राजनीति में , सिकलीगरों की जमात ,
अपना वर्चस्व जमा लेती है ,
तब , खामोशी भी सवाल करने लगती है ,
और सवाल होता है -
कोयला , सफ़ेद क्यों नहीं होता - ?
इसका जवाब -
कोयला कभी नहीं दे पाता --
यक्ष प्रशन ,
गूंजता रह जाता है ...........

भोलानाथ त्यागी ,
मोबा -09456873005 See more — with Chandi Dutt Shukla and 15 others.
2LikeUnlike · ·

धूमिल की कविताएं

चित्र
Browse:Home/पुरालेख/धूमिल की कवितायें
By फ़ुरसतिया on May 10, 2006
सुदामाप्रसाद पाण्डेय’धूमिल’ मेरे पसंदीदा कवि हैं। धूमिल की कविताओं के संकलन ‘संसद से सडक तक’ तथा ‘कलसुनना मुझे’ समकालीन कविता में उल्लेखनीय माने जाते हैं। धूमिल की कविताओं के अंश लोग अपने लेखों ,भाषणों को असरदार बनाने के लिये करते हैं।
धूमिल का जन्म वाराणसी के खेवली गांव में हुआ था। पढ़ने में मेधावी थे लेकिन शिक्षा दसवीं तक ही हुई। दसवीं के बाद आई टी आई वाराणसी से विद्युत प्राप्त करके इसी संस्थान में विद्युत अनुदेशक के रूप में कार्यरत रहे।
३८ वर्ष की अल्पायु में धूमिल की मष्तिष्क ज्वर से मृत्यु हो गयी।
प्रसिद्ध कथाकार काशीनाथ सिंह धूमिल के मित्रों में से थे । उन्होंने धूमिल पर बेहद आत्मीय लेख लिखे हैं।जिससे धूमिल की सोच का पता चलता है। धूमिल के बारे में एक लेख प्रसिद्ध लेखक श्रीलाल शुक्ल ने भी लिखा है जब धूमिल अपने इलाज के सिलसिले में लखनऊ थे। अशोक चक्रधर के संस्मरणात्मक लेख से उनके व्यक्तित्व का अंदाजा लगता है।
धूमिल की कुछ कवितायें अनुभूति में संकलित हैं। लेकिन जिन कविताओं के लिये धूमिल जाने जाते हैं-मोचीराम, राजकमलचौधर…

पथ के साथी - महादेवी वर्मा

चित्र
http://hi.wikipedia.org/s/13k5
मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पथ के साथी लेखकमहादेवी वर्मादेशभारतभाषाहिंदीविषयसंस्मरणप्रकाषकराधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्लीप्रकाषन कि तिथी1956पन्नें92आई.एस.बी.एनHB-04755पथ के साथीमहादेवी वर्मा द्वारा लिखे गए संस्मरणों का संग्रह हैं, जिसमे उन्होंने अपने समकालीन रचनाकारों का चित्रण किया है। जिस सम्मान और आत्मीयतापूर्ण ढंग से उन्होंने इन साहित्यकारों का जीवन-दर्शन और स्वभावगत महानता को स्थापित किया है वह अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। 'पथ के साथी' में संस्मरण भी हैं और महादेवी द्वारा पढ़े गए कवियों के जीवन पृष्ठ भी। उन्होंने एक ओर साहित्यकारों की निकटता, आत्मीयता और प्रभाव का काव्यात्मक उल्लेख किया है और दूसरी ओर उनके समग्र जीवन दर्शन को परखने का प्रयत्न किया है।
'पथ के साथी' में निम्नलिखित 11 संस्मरणों का संग्रह किया गया है-
दद्दा (मैथिली शरण गुप्त)निराला भाईस्मरण प्रेमचंदप्रसादसुमित्रानंदन पंतसुभद्रा (कुमारी चौहान)प्रणाम (रवींद्रनाथ ठाकुर)पुण्य स्मरण (महात्मा गांधी)राजेन्द्रबाबू (बाबू राजेन्द्र प्रसाद)जवाहर भाई (जवाहरला…

महादेवी वर्मा का संस्मरण - प्रेमचंद जी

प्रेमचंदजी से मेरा प्रथम परिचय पत्र के द्वारा हुआ। तब मैं आठवीं कक्षा की विद्यार्थिनी थी!। मेरी 'दीपक' शीर्षक एक कविता सम्भवत: 'चांद' में प्रकाशित हुई। प्रेमचंदजी ने तुरन्त ही मुझे कुछ पंक्तियों में अपना आशीर्वाद भेजा। तब मुझे यह ज्ञात नहीं था कि कहानी और उपन्यास लिखने वाले कविता भी पढ़ते हैं। मेरे लिए ऐसे ख्यातनामा कथाकार का पत्र जो मेरी कविता की विशेषता व्यक्त करता था, मुझे आशीर्वाद देता था, बधाई देता था, बहुत दिनों तक मेरे कौतूहल मिश्रित गर्व का कारण बना रहा।
उनका प्रत्यक्ष दर्शन तो विद्यापीठ आने के उपरान्त हुआ। उसकी भी एक कहानी है। एक दोपहर कौ जब प्रेमचंदजी उपस्थित हुए तो मेरी भक्तिन ने उनकी वेशभूषा से उन्हें भी अपने ही समान ग्रामीण या ग्राम-निवासी समझा और सगर्व उन्हें सूचना दी--गुरुजी काम कर रही हैं।
प्रेमचंदजी ने अपने अट्टहास के साथ उत्तर दिया--तुम तो खाली हो। घडी-दो घड़ी बैठकर बात करो।
और तब जब कुछ समय के उपरान्त मैं किसी कार्यवश बाहर आई तो देखा नीम के नीचे एक चौपाल बन गई है। विद्यापीठ के चपरासी, चौकीदार, भक्तिन के नेतृत्व में उनके चारों ओर बैठे हैं और लोक-चर्चा …