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शेरजंग गर्ग की कविताएं

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क्या हो गया कबीरों को / शेरजंग गर्ग
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क्या हो गया कबीरों को / शेरजंग गर्ग ग़लत समय में सही बयानी / शेरजंग गर्गखुद से रूठे हैं हम लोग / शेरजंग गर्गआदमी हर तरह लाचार है / शेरजंग गर्गसतह के समर्थक समझदार निकले / शेरजंग गर्गआदमी की अज़ीब सी हालत है / शेरजंग गर्गहौंसलों में फ़कत उतार सही / शेरजंग गर्गआवाज़ आ रही है / शेरजंग गर्गमत पूछिए क्यों / शेरजंग गर्गकोई शहर गुमशुदा है / शेरजंग गर्गकाफ़ी नहीं तुम्हारा / शेरजंग गर्गदर्द की चाशनी है / शेरजंग गर्गमेरे समाज की हालत / शेरजंग गर्गस्वच्छ, सजग अधिकार कहाँ / शेरजंग गर्गसब करार को तरसे / शेरजंग गर्गकाँच निर्मित घरों के / शेरजंग गर्गऐसी हालत मे क्या किया जाए / शेरजंग गर्गहम क्यों न सबको ठीक तरज़ू पे तोलते / शेरजंग गर्गबुझ गई रोशनी / शेरजंग गर्गचोटियों में कहाँ गहराई है / शेरजंग गर्गखुश हुए मार कर ज़मीरों को / शेरजंग गर्गजब पूछ लिया उनसे / शेरजंग गर्गन पूछिए हम कहाँ से / शेरजंग गर्गआप कहने को बहुत ज्यादा बड़े है / शेरजंग गर्गचन्द सिक्को की खुराफ़ात से क्या होना है / शेरजंग गर्गनर्म रहकर न यहाँ बैठना, न चलना होगा / शेरज…

अदम गोंडवीकी कविता

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CHANDER
आइए महसूस करिए जिन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी की कुएं में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी खामोशी का कारण कौन है
थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेिड़या है घात में
होनी से बेखबर कृष्ना बेखबर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख निकली भी तो होठों…

कबीर का ब्राह्मण से संवाद / कॅंवल भारती

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September 4, 2012 | Filed underबहस | Posted by 9 बुद्ध और ब्राह्मण का संघर्ष ‘वर्ण-संघर्ष’ के सिवा कुछ नहीं था कॅंवल भारती ब्राह्मण गुरु जगत का, साधु का गुरु नाहिं।
उरझि-पुरझि करि मरि रह्या, चारिउ वेदा माँहि।।
(क.ग्र. पृष्ठ 28)
कहु पाँडे कैसी सुचि कीजै।
        सुचि कीजै तौ जनम न लीजै।।
(वही, पृष्ठ 129)
ब्राह्मण के साथ कबीर का अत्यन्त तीखा संवाद है। उसे देखकर ऐसा लगता है, जैसे एक महासंग्राम था कबीर और ब्राह्मण के बीच। क्या यह महासंग्राम नेतृत्व को लेकर था? यदि हाँ, तो नेतृत्व की यह लड़ाई किस क्षेत्र में थी? ब्राह्मण हिन्दू धर्म, समाज और सत्ता तीनों का अगुवा था। क्या कबीर उससे यह अगुवाई छीनना चाहते थे? अवश्य ही ऐसा नहीं था। ‘ना हिन्दू और ना मुसलमान’ चेतना के कबीर को ब्राह्मण के हिन्दुओं का नेतृत्व करने पर कोई ऐतराज नहीं था। वह शाक्तों, शैवों, वैष्णवों, सिद्ध – योगियों का भी नेतृत्व कर रहा था, इससे भी उन्हें कोई समस्या नहीं थी। उन्हें समस्या इस बात को लेकर थी कि ब्राह्मण दलित जातियों का भी नेता बन रहा था। ब्राह्मण का ‘हिन…

कामशास्त्र की भारतीय परंपरा में सेक्‍स

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शुक्रवार, 20 नवम्बर 2009कामसूत्र की उत्पत्ति की शास्त्रकथा बड़ी रोचक है। इस कथा का भी यदि देरीदियन मूल्यांकन किया जाए तो अनेक नए पक्षों पर रोशनी पड़ती है। पहली बात यह निकलती है कि कामशास्त्र, अर्थशास्त्र और आचार शास्त्र का हिस्सा है।आरंभ में ब्रह्मा ने एक लाख अध्यायों का एक विशाल ग्रंथ बनाया।उस शास्त्रार्णव का मंथन कर मनु ने एक पृथक आचार शास्त्र बनाया।जो मनुसंहिता या धर्मशास्त्र के नाम से विख्यात है। ब्रह्मा के ग्रंथ के आधार पर बृहस्पति ने ब्रार्हस्पत्यम् अर्थशास्त्र की रचना की। ब्रह्मा के ग्रंथ के आधार पर ही महादेवजी के अनुचर नंदी ने एक हजार अध्यायों के कामशास्त्र की रचना की। उसी संस्करण के आधार पर श्वेतकेतु ने पांच सौ अध्यायों का संक्षिप्त संस्करण तैयार किया। श्वेतकेतु की रचना के आधार पर बाभ्रव्य ने डेढ सौ अध्यायों का संस्करण तैयार किया। यही वह बिन्दु है जहां से कामशास्त्र की नयी परंपरा सामने आती है। बाभ्रव्य के पहले कामशास्त्र वाचिक परंपरा का अंग था,बाभ्रव्य ने ही उसे शास्त्र का रूप दिया। कालान्तर में बाभ्रव्य के कामशास्त्र में अनेक चीजें जोड़ी गईं,और अनेक अध्यायों को स…