संदेश

July, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कुमार रविन्द्र की नजर में कबिरा की कासी

एक स्मृतिगाथा कबिरा की कासी की

‘बनारस
एक चादर है
जिसकी बुनावट में कहीं-न-कहीं कबीर हैं

जो भी इसे
साँचे मन से ओढ़ता है एक बार
अलग नहीं रह पाता एक पल भी
स्मृति से
ऐसी लिपट जाती है वह चादर’
— शिवकुमार पराग कबिरा की कासी, बाबा विश्वनाथ की काशीनगरी, आम आदमी का बनारस और शासकीय केन्द्र वाराणसी— इन्हें मेरा जानना आज से लगभग पचास वर्ष पूर्व का है। और, सच में, तभी से लिपटी है मेरी स्मृति से कबीराई बुनावट की यह चादर।हाँ,जतन-से-ओढ़ी-नहीं-गई यह चादर पता नहीं कहाँ-कहाँ का मैल लपेट लाई है। भारतेन्दु की नगरी से बहुत दूर मैं आ बसा हूँ उनके पूर्वजों के मूलस्थान अग्रोहा के पड़ोसी नगर हिसार-ए-फिरोज़ा में। इस पचास साल के अंतराल में बस दो बार जा सका हूँ बनारस, किंतु दोनों बार पचास वर्ष पहले का ही बनारस मेरी याद से लिपटा रहा। इक्कीसवीं सदी की तेज चाल में ढलता, ‘मल्टीप्लेक्स’ और ‘मैक्डोनाल्ड’ की फ़िलवक्ती रवायत को अपनाता आधुनिक बनारस पिछली बार इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में जाने पर भी पता नहीं क्यों मेरी नज़रों में नहीं आया। आधी सदी के बाद भी बनारस मेरी यादों में वैसा ही रहा अलमस्त और चउचक, जैसा तब था, जब मैं…

बालक / प्रेमचंद

गंगू को लोग ब्राह्मण कहते हैं और वह अपने को ब्राह्मण समझता भी है। मेरे सईस और खिदमतगार मुझे दूर से सलाम करते हैं। गंगू मुझे कभी सलाम नहीं करता। वह शायद मुझसे पालागन की आशा रखता है। मेरा जूठा गिलास कभी हाथ से नहीं छूता और न मेरी कभी इतनी हिम्मत हुई कि उससे पंखा झलने को कहूँ। जब मैं पसीने से तर होता हूँ और वहाँ कोई दूसरा आदमी नहीं होता, तो गंगू आप-ही-आप पंखा उठा लेता है; लेकिन उसकी मुद्रा से यह भाव स्पष्ट प्रकट होता है कि मुझ पर कोई एहसान कर रहा है और मैं भी न-जाने क्यों फौरन ही उसके हाथ से पंखा छीन लेता हूँ। उग्र स्वभाव का मनुष्य है। किसी की बात नहीं सह सकता। ऐसे बहुत कम आदमी होंगे, जिनसे उसकी मित्रता हो; पर सईस और खिदमतगार के साथ बैठना शायद वह अपमानजनक समझता है। मैंने उसे किसी से मिलते-जुलते नहीं देखा। आश्चर्य यह है कि उसे भंग-बूटी से प्रेम नहीं, जो इस श्रेणी के मनुष्यों में एक असाधरण गुण है। मैंने उसे कभी पूजा-पाठ करते या नदी में स्नान करते नहीं देखा। बिलकुल निरक्षर है; लेकिन फिर भी वह ब्राह्मण है और चाहता है कि दुनिया उसकी प्रतिष्ठा तथा सेवा करे और क्यों न चाहे ? जब पु…