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आधुनिक संस्कृत लेखक

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अधिक जानकारी के लिये दाहिनी ओर [दिखाएँ] पर क्लिक करें।[दिखाएँ] दुनियाँ की सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत का प्राचीन साहित्य तो सर्वाधिक समृद्ध है ही किन्तु वर्तमान आधुनिक काल में भी संस्कृत कवियों , लेखकों की कमी नहीं है। जहाँ एक ओर संस्कृत पत्र पत्रिकायें, दैनिक समाचार पत्र प्रकाशित हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर हजारों कवि, लेखक निरन्तर कविता , नाटक , कहानी , उपन्यास आदि लिखकर संस्कृत को मृतभाषा कहने वालों को चुनौती दे रहे हैं।
Header textHeader textHeader textExampleExampleExampleExampleExampleExampleExampleExampleExampleवर्तमान समय में भारत के सभी प्रदेशों में समान रूप से संस्कृत के ग्रन्थ लिखे और पढे जा रहे हैं। संस्कृत के आधुनिक साहित्यकारों द्वारा लिखित सभी पुस्तकों का परिचय यहां देना संभव नहीं है पर उनकी बहु चर्चित कृतियों की जानकारी निम्नानुसा…

पत्रकार बालमुकुंद गुप्त

http://hi.wikipedia.org/s/27z8 मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से बालमुकुंद गुप्त (१४ नवंबर१८६५ - १८ सितंबर१९०७ ) का जन्म गुड़ियानी गाँव, जिला रोहतक, हरियाणा में में हुआ। उन्होने हिन्दी के निबंधकार और संपादक के रूप हिन्दी जगत की सेवा की।
जीवनीउर्दू और फारसी की प्रारंभिक शिक्षा के बाद 1886 ई. में पंजाब विश्वविद्यालय से मिडिल परीक्षा प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में उत्तीर्ण। विद्यार्थी जीवन से ही उर्दू पत्रों में लेख लिखने लगे। झझ्झर (जिला रोहतक) के ‘रिफाहे आम’ अखबार और मथुरा के ‘मथुरा समाचार’ उर्दू मासिकों में पं. दीनदयाल शर्मा के सहयोगी रहने के बाद 1886 ई. में चुनार के उर्दू अखबार ‘अखबारे चुनार’ के दो वर्ष संपादक रहे। 1888-1889 ई. में लाहौर के उर्दू पत्र ‘कोहेनूर’ का संपादन किया। उर्दू के नामी लेखकों में आपकी गणना होने लगी। 1889 ई. में महामना मालवीय जी के अनुरोध पर कालाकाँकर (अवध) के हिंदी दैनिक ‘हिंदोस्थान’ के सहकारी संपादक हुए जहां तीन वर्ष रहे। यहां पं. प्रतापनारायण मिश्र के संपर्क से हिंदी के पुराने साहित्य का अध्ययन किया और उन्हें अपना काव्यगुरू स्वीकार किया। सरकार के विरूद्ध लिखन…

डच भाषा

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http://hi.wikipedia.org/s/lco मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से इस लेख में सन्दर्भ या सूत्र नहीं दिए गए हैं।
कृपया विश्वसनीय सूत्रों के सन्दर्भ जोड़कर इस लेख में सुधार करें। बिना सूत्रों की सामग्री को हटाया जा सकता है। (सितंबर 2011)भाषा का नामबोली जाती है—क्षेत्र—कुल बोलने वाले—भाषा परिवार
{{{name}}}भाषा कूटISO 639-1NoneISO 639-2ISO 639-3सूचना: इस पन्ने पर यूनीकोड में अ॰ध॰व॰ (आई पी ए) चिह्न हो सकते हैं।डच भाषा (डच : Nederlands उच्चारणः नेडेर्लाण्ड्स) नीदरलैंड देश की मुख्यभाषा और राजभाषा है । यह हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार की जर्मैनी शाखा में आती है । क्योंकि ये एक निम्न जर्मनिक भाषा है, इसलिये ये अंग्रेज़ी से काफ़ी मेल खाती है । इसकी लिपि रोमन लिपि है ।
नीदरलैंड के अतिरिक्त यह बेल्जियम के उत्तरी आधे भाग में, फ्रांस के नार्ड जिले के ऊपरी हिस्से में तथा यूरोप के बाहर डच न्यूगिनी आदि क्षेत्रों में बोली जाती है। संयुक्त राज्य अमरीका तथा कनाडा में रहनेवाले डच नागरिकों की भी यह मातृभाषा है। दक्षिण अफ्रिकी यूनियन राज्य में भी बहुत से डच मूल के नागरिक रहते हैं और उनकी भाषा भी डच भाषा से बहुलांश म…

रामलीला / -मुंशी प्रेमचन्द

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 कहानी धरोहर



रामलीला /  -मुंशी प्रेमचन्द          -मुंशी प्रेमचन्द इधर एक मुद्दत से रामलीला देखने नहीं गया। बंदरों के भद्दे चेहरे लगाए, आधी टाँगों का पाजामा और काले रंग का ऊँचा कुर्ता पहने आदमियों को दौड़ते, हू-हू करते देखकर अब हँसी आती है, मज़ा नहीं आता। काशी की लीला जगद्विख्यात है। सुना है, लोग दूर-दूर से देखने आते हैं। मैं भी बड़े शौक से गया, पर मुझे तो वहाँ की लीला और किसी वज्र देहात की लीला में कोई अंतर न दिखाई दिया। हाँ, रामनगर की लीला में कुछ साज-सामान अच्छे हैं। राक्षसों और बंदरों के चेहरे पीतल के हैं, गदाएँ भी पीतल की हैं, कदाचित बनवासी भ्राताओं के मुकुट सच्चे काम के हों; लेकिन साज-सामान के सिवा वहाँ भी वही हू-हू के सिवाय कुछ नहीं। फिर भी लाखों आदमियों की भीड़ लगी रहती।

लेकिन एक ज़माना वह था, जब मुझे भी रामलीला में आनंद आता था। आनंद तो बहुत हलका-सा शब्द है। वह आनंद उन्माद से कम न था। संयोगवश उन दिनों मेरे घर से बहुत थोड़ी दूर पर रामलीला का मैदान था, और जिस घर में लीला-पात्रों का रूप-रंग भरा जाता था, वह तो मेरे घर से बिलकुल मिला हुआ था।

दो बजे दिन से पात्रों की सजा…

मौलाना अबुलकलाम आज़ाद (१८८८ - १९५८)

एक क्रान्तिकारी पत्रकार और स्वतन्त्रता सेनानी सय्यद मुज़म्मिलुद्दीन
अप्रेल 2004

अंग्रेजी भाषा की एक लोकप्रिय कहावत है कि कलम तलवार से अधिक शक्तिशाली है। मानव इतिहास में इस बात की पुष्टि उन अनगिनत चिंतकों से हुई जिन्होंने अपने लेखन से अपने समय की जनता के जीवन और चिन्तन में चमत्कारी परिवर्तन लाये। इसकी कई मिसालें हमारे स्वतन्त्रता आंदोलन में देखने में आइंर् जिनमें पत्रकारिता ने खास भूमिका का प्रदर्शन किया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ' नवजीवन' और 'हरिजन' के द्वारा अंग्रेज़ सरकार के अत्याचारों के विरूद्ध आवाज़ उठाई और सामाजिक बुराइयों की रोकथाम का प्रयत्न किया जबकि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने अपने समाचार पत्रों `` अल हिलाल'' और `` अलबलाग'़' के माध्यम से समस्त भारय् की जनता में स्वतन्त्रता आन्दोलन के प्रति एक नया जागरण शुस्र् किया।
यह कहना गलत नहीं होगा कि मौलाना आज़ाद की पत्रकारिता उनके राष्ट्रप्रेम और स्वतन्त्रता के सिद्धान्तों के प्रति उनके दृढ़ विश्वस …

अमृतलाल चक्रवर्ती

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भारत डिस्कवरी प्रस्तुति लेख ♯ (प्रतीक्षित) गणराज्यकलापर्यटनदर्शनइतिहासधर्मसाहित्यसम्पादकीयसभी विषय ▼ अमृतलाल चक्रवर्ती पूरा नामअमृतलाल चक्रवर्ती जन्म1863 ई. जन्म भूमिकोलकाता, पश्चिम बंगालमृत्यु1936 ई. मृत्यु स्थानकोलकाता, पश्चिम बंगालकर्म-क्षेत्रसाहित्य मुख्य रचनाएँउपन्यास कुसुम, निगभागम चंद्रिका, उपन्यास तरंग, श्रीकृष्ण संदेश विषयउपन्यास, पत्रिका भाषाहिन्दी, बांग्लाशिक्षाएलएल. बी. नागरिकताभारतीय इन्हें भी देखेंकवि सूची, साहित्यकार सूचीअमृतलाल चक्रवर्ती (जन्म- 1863, कोलकाता; मृत्यु- 1936, कोलकाता) बंगाली भाषीहिन्दी-सेवा के व्रती लेखक तथा पत्रकार थे। इन्होंने साप्ताहिक 'हिन्दी बंगवासी' (कलकत्ता) का सम्पादन लगभग दस वर्ष तक किया। यह हिन्दी साहित्य सम्मेलन के 16 वें अधिवेशन (वृन्दावन) के सभापति रहे।
कार्यक्षेत्रअमृतलाल चक्रवर्ती ने औपचारिक शिक्षा पूरी करने से पूर्व ही इलाहाबाद में प्रकाशित 'प्रयाग-समाचार' पत्र से पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया। कुछ ही दिन कालाकांकर से प्रकाशित राजा रामपाल सिंह के पत्र 'हिन्दोस्थान' में भी रहे। वहाँ से कोलकाता जाकर उन्होंने…