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युवा कवि सुरेश कुमार वशिष्ठ की खासियत

मन की देहरी पर गहन आत्मीयता के साथ कह जाना युवा कवि सुरेश कुमार वशिष्ठ की खासियत है। इनकी कविताएं पढ़कर संबंधों के प्रति लगाव का एहसास होता है। युवा कथाकार आकांक्षा पारे काशिव के शब्दों में, "सुरेश की कविताएं पढ़कर लगता है कि अभी कविता के दिन बाकी हैं।" सच में सुरेश ने कविता को न सिर्फ रचा है बल्कि उसे अपने तरीके से हमारे सामने रखा है-- गुनगुनी धुप में घास पर चमकते ओस की ताज़गी हर शब्द में है। जैसे बरस चुके बरसात के बाद मौसम की अंगराई, नरम माटी, गीले पत्ते और पेड़ों से उसकी तरुणाई की कच्ची कुवारी गंध। शब्द कभी बेजान नहीं लगते।
Suresh Kumar Vashishth, आमोद महेश्वरी, Rajkamal Prakashan Samuh, Suraj Kumar, Nalin Chauhan, Pramod Chauhan See translation Like

लघु-पत्रिका आंदोलन : संरचना और सरोकार

राजीव रंजन गिरि हिंदी साहित्य के अतीत और वर्तमान को पहचानने और विश्लेषित करने की कोई भी कोशिश, लघु-पत्रिकाओं की दुनिया पर नजर डाले बिना, पूरी नहीं हो सकती। साठ और सत्तर के दशक में उभरे हिंदी लघु-पत्रिकाओं के विविध-विशद संसार को एक संस्थागत सांस्कृतिक आंदोलन का रूप देने की कोशिश नब्बे के दशक में की गई। खास बात यह थी कि यह पहल, कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व में चलने वाले लेखक संगठनों से, अलग तरह की थी। दूसरे, उस समय तक सांस्कृतिक आंदोलन के लिए जरखेज समझी जाने वाली साहित्य की जमीन बदली हुई राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों में, नई परिभाषाओं की, माँग कर रही थी। चुनौतियों का स्वरूप पहले जैसा नहीं रह गया था। विचारधारा, प्रतिबद्धता, प्रतिरोध, समाज-रचना, व्यावसायिकता और रचनाशीलता जैसे प्रत्यय संशोधन की माँग कर रहे थे। इस नई परिस्थिति में साहित्यकारों और लघु-पत्रिकाओं के संपादकों को एक ऐसे द्वैध का सामना करना पड़ा जो नए वक्त की सांस्कृतिक बेचैनियों की नुमाइंदगी कर रहा था।
परिभाषा का प्रश्न हिंदी में लघु-पत्रिका का मतलब लघु आकार, प्रसार का लघु दायरा और प्रकाशन की लघु संरचना तो है ही, ख…

लघुपत्रिकाएँ एवं साहित्यिक पत्रकारिता

मनोज कुमार श्रीवास्तव





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(भारत भवन, भोपाल में लघु पत्रिकाओं से सम्बन्धित तीन दिवसीय परिसंवाद (12, 13 और 14 जून 2009) में संस्कृति सचिव मनोज कुमार श्रीवास्तव द्वारा दिये गये स्वागत एवं समापन भाषण)
स्वागत भाषण
मित्रो, ध्यान दें कि आज से 100 वर्ष पूर्व ‘हिन्दी प्रदीप’ का प्रकाशन बंद हुआ था. हम उसकी शतवार्षिकी मनाने के उद्देश्य से यह आयोजन नहीं कर रहे हैं. लेकिन प्रदीप का बुझना साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए एक सबक अवश्य था. यह ठीक था. कि ‘प्रदीप’ औपनिवेशिक शासन की प्रकट निष्ठुरता से, उस दौर में 3000/ की जमानत मांगने से बंद हुआ, लेकिन क्या वह आखिरी तिनका तो नहीं था. ‘प्रदीप’ के संपादक की व्यथा तो अपनों की उदासीनता में भी थी. उसने उनके मन में इतनी कड़वाहट, इतनी खटास भर दी थी कि उनकी संपादकीय भाषा भी तिक्त हो चली थी. ”उन चांडाल महापतियों को कौन सी उपाधि दें जो बरसों तक बराबर पत्रा गटकते गए, मांगते-मांगते हैरान हो गये, पर मूल्य न पाया.“ ”और हरामी पिल्लों की जथा अलबत्ता जुदी है, जिनका मनसूबा यही रहता है कि साल भर पत्रा लेने के उपरान्…