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राजेन्द्र यादव'मुड़-मुड़के देखता हूँ'... ...

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प्रो. एम. वेंकटेश्वर
हिंदी साहित्य के आधुनिक युग में अन्य गद्य विधाओं के साथ आत्मकथा एवं जीवनी लेखन का प्रारम्भ हुआ। ऐतिहासिक दृष्टि से हिंदी की प्रथम आत्मकथा बनारसीदास कृत 'अर्धकथानक' मानी गई है। बनारसीदास का 'अर्धकथानक' एक अद्वितीय और अनोखी रचना है। यह हिंदी में लिखी हुई पहली आत्मकथा मानी जाती है। बनारसीदास ने अपनी आत्मकथा समकालीन ब्रजभाषा में सन् 1641 में लिखी। उस समय वे पचपन वर्ष के थे। जैन शास्त्रों के अनुसार मनुष्य का पूर्ण जीवन काल 110 वर्षों का होता है इसलिए बनारसीदास ने अपनी इस पचपन वर्षों की कहानी को 'अरध कथान' कहा है। परंतु यह उनकी पूर्ण कथा ही कही जा सकती है, क्योंकि 'अर्धकथानक' लिखने के दो तीन वर्षों बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। हिंदी साहित्य का मध्यकाल ब्रज, अवधी, राजस्थानी आदि भाषाओं में पद्य साहित्य का रचना काल था इसीलिए बनारसीदास ने अपनी इस आत्मकथा को दोहा-चौपाई शैली में पद्य में ही लिखा है। प्रकारांतर से मूल पाठ के साथ हिंदी गद्यानुवाद को जोड़कर इसे पुन: प्रकाशित किया गया। हिंदी में …