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रॉबिन शॉ पुष्प

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रॉबिन शॉ पुष्प के साथ एक युग का अवसान हो गया! कल हिंदी के वरिष्ठ लेखक रॉबिन शॉ पुष्प का निधन हो गया. आजीवन मसिजीवी रहे इस लेखक ने बिहार की कई पीढ़ी के रचनाकारों को प्रभावित किया. उनको याद करते हुए आज प्रसिद्ध लेखक हृषिकेश सुलभ ने अच्छा लिखा है. 'दैनिक हिन्दुस्तान' से साभार यह लेख आपके लिए- मॉडरेटर 
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हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक, कथाकार और उपन्यासकार रॉबिन शॉ पुष्प का अवसान साहित्य की, एक ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई संभव नहीं। वह उस पीढ़ी के लेखक थे, जिसने साहित्य को मनसा, वाचा कर्मणा जिया। उन्होंने कहानी, उपन्यास, नाटक, रेडियो नाटक, बाल साहित्य, संस्मण से लेकर साहित्य की लगभग तमाम विधाओं में लिखा। वह पूर्णकालिक लेखक थे। उनकी पहली कहानी 1957 में धर्मयुग में छपी। तब से वह अनवरत लिखते रहे। लेकिन आज उनकी यात्रा सदा के लिए थम गई। पटना से बाहर हूं। मोतीहारी के पास एक गांव में। कुआं के जगत की मुंड़ेर पर बैठा एक युवा सेमल के कांटेदार तने को एकटक निहार रहा हूं। सामने कई तरह के वृक्षों का सघन विस्तार है। सूर्य अस्ताचल को जा रहे हैं। कल सांझ असंख्य लोगों न…

साहित्य झरोखा / संस्मरण

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Category: संस्मरणश्यूं-बाघ : देवेंद्र मेवाड़ीMar. 02संस्मरण2 comments
कथाकार देवेंद्र मेवाड़ी की पुस्तक ‘मेरी यादों का पहाड़’ नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया से प्रकाशित हुई है। इसमें पचास-साठ वर्ष  पहले के उनके गाँव, वहाँ के लोग, उनके सुख-दुख का सजीव चि‍त्रण हुआ है। यह पुस्‍तक पहाड़ी संस्‍कृति‍ को जानने-समझने में भी सहायक है। इस पुस्‍तक का एक अंश-
द ऽ, श्यूं-बाघों के तो किस्से ही किस्से ठैरे मेरे गाँव में। मुझे जैंतुवा ने कई बार रात में जंगल से आती ‘छां’ फाड़ने की गज्यांठि की जैसी घुर्र, घुर्र, घुर्र की आवाज सुना कर बताया, “ददा, बाघ बासनारो।” पहाड़ के गाँव में थे तो बकरियाँ और कुत्ते चुराने वाले वे छोटे-मोटे बाघ सचमुच मट्ठा मथने की फिरकी की तरह ही घुर्राते थे। लेकिन, सर्दियों में जब हम श्यूं-बाघों के असली इलाके मतलब अपने सर्दियों के गाँव ककोड़ जाते थे और भुंयारे यानी एक ही तल्ले के कोप के पत्थरों से बने अपने मकान या घास-फूस के मजबूती से बने बड़े से गोठ में रहते थे तो रात को पास ही से निकलती कच्ची सड़क पर, साज के पेड़ के सामने, उध्योंन के बड़े पत्थर के पास रुक कर दहाड़ते श्यूं की दिल दहलान…