गरीब भारत की कथा व्यथा







अनामी शरण बबल


हिन्दुस्तान यानी भारत को आमतौर पर दो नाम से जाना जाता है भारत और  इंडिया के रूप में यही दो चेहरा जगत विख्यात है। मॉल मेट्रो मोबाइल मल्टीप्लेक्स मल्टीनेशनल कंपनियां मल्टीस्टोरी अपार्टमेंट मनी मैनेजमेंट मल्टी मोटर हैबिट  और मल्टी जॉब के साथ साथ मल्टी रिलेशन का जमाना है। जिसकी चमक दमक और रौनक से पूरा इंड़िया गुलजार है। महज 10 फीसदी अमीरों के वैभवपूर्ण रहन सहन और जीवन शैली से अपना इंडिया भी किसी विकसित देश से कहीं कम नहीं दिखता है। मगर गांवो गलियों और गरीबों के इस भारत में 40 फीसदी लोग आज भी बुनियादी जरूरतों और दो जून की रोटी के लिए भी दूसरों पर मोहताज है।

 एकदम युवा कथाकार भरत प्रसाद का ताजा कहानी संग्रह चौबीस किलो का भूत सबसे पहले अपने नाम के अनोखेपन से सहसा अपनी तरफ ध्यान खिंचता है।  कथाका भरत प्रसाद की कहानियों में कई तरह के नयापन का प्रयोग है, मगर मुझे लगता है कि कहानियों पर बात करने से पहले इसके कथाकार पर बात करन भी जरूरी है। भारत के सबसे आधुनिक विवि के रूप में विख्यात जवाहरलाल नेहरू विवि में पढ़े और वहीं से पीएचडी करने वाले भरत बड़ी आसानी से दिल्ली या आस पास के किसी विवि से जुड़कर अपने लेखकीय  चमक दमक के सथ लेखन की मुख्यधारा में रह सकते थे। मगर दिल्ली से काफी दूर शिलांग में जाकर हिन्दी के विकस प्रचार प्रसार और अध्यापन करना चकित करता है। यही मुख्य कारण है कि भरत प्रसाद को लेकर मेरे मन में एक उत्सुकता प्रकट हुई। और इनके लेखन को लेकर मैने जानने की रूचि दिखाई। भले ही देर से ही मान्यत मिले पर इनकी कहानियों को बड़े स्तर स्वीकार्य किया जाएगा। खासकर इनकी शैली भविष्य में एक अलग कथाधारा को भी प्रवाहित कर सकती है।
इनकी कहानियों का सबसे बड़ा अनोखापन यह है कि कहानियां खुद आगे नहीं बढती या अपनी कहानी की धारा में बहती है। इनकी शांत कहानियों को लगता है कि मानो वे किसी दंतकथा सी खुद कथा बयान कर रही हो। पढ़ते हुए भी अक्सर लगता है मानो कहानी सुनायी जा रही है। वह भी भावपूर्ण सरल सरस अंदाज में भाषा की रवानी और धारावाह लय ताल के साथ। कभी कभी तो एकदम छायावादी काल की कविता सी मोहक और प्राकृतिक सौंदर्यमय भाषा से मन को रीझाता भी है तो कभी लगता कि यह प्राकृतिक सौंदर्य बोध कुछ ज्यादा हो रहा है, मगर भाषा की लयात्मक प्रवाह कहानी की धारा से विमुख होकर भी पाटको को कहानी से जोड़े रखती है। एक कहानी के भीतर ही कई कहानियों के संगम भी देखने को मिलता है। सब एक ही कहानी के अलग अलग चैप्टर होकर भी संयुक्त हो कथा को बड़े फलक पर प्रस्तुत करने में सहायता करती है।  24 किलो का भूत कहानी संग्रह में केवल आठ कहानियं है मगर ये कहानियं आज के गरीब भारत के नागरिकों की पीड़ा भय अविश्वास संशय डर और अपनी असुरक्षा से ग्रसित नागरिकों के कमजोर चरित्र को अलग तरीके से सामने रखती है। कहानी के ज्यादातर पात्रों में समाज से टकराने का हौसला नहीं है। हालांकि बुलंद फैसला करने की हिम्मत तो है मगर अपने फैसले पर अंत अंत तक पात्रों का टूट जाना कहीं से भी अप्रत्याशित नहीं लगता। खासकर अपने बीमार पात्रों की पीडा से ये कहानियं समाज को दर्पण बन जाती है। धरनी में धसौं, की कासहिं चीरौं  कहानी तमाज की तमाम मान्यतों को नकार देती गै। अमूमन मां अपने संतान को किसी भी कीमत पर दूसरों को नहीं सौंपती है,मगर इस कथा की नायिक रामदेई अपने कंगाली की वजह से कई बच्चों की मौत हो जाने के बाद अपने एक बच्चे को पास रखने को तैयार नहीं है। अपना बच्चा किसको देगी यह भी नहीं जानती मगर उसके सिर पर अपने मरे हुए कई बच्चों का इतना दर्द है कि वो हर हाल में बच्चे को अपने से दूर कर देना ही चाह रही है। किसी को देने के लिए अपने बच्चे को लेकर रामदेई घर से निकल जाती है। और भटकती हुई रामदेई अंतत अपने बच्चे को संयोग से मिल गए एक सज्जन चक्रधर दास को देकर ही संतोष से भर जाती है। मगर कुछ ही घंटो में वो बिन बालक खुद को मार लेती है। पत्नी के इंतजार और अपने खोए पुत्र की तलाश में ही पति दयाल लगा रहता मगर पुत्र की वापसी से कहानी रोमांचक हो जाती है। मगर अपने बेटे शीतल के जीवन के लिए अभिशाप सा महसूस करके दयाल भी अपनी जीवन लीला को खत्म कर लेता है। तकि बेटे के जीवन पर असर न हो । उधर अपने बीमार पति के इलाज के लिए पत्नी द्वारा एक निसंतान के साथ कोख का सौदा करना जितना अप्रत्याशित लगता है उससे कहीं ज्यादा सुखद पुत्र की ललक में सौदे से इंकार कर बेसहारा होकर भी उसका संघर्ष करना लड़ना है। अपनी पत्नी की बेवफाई से शर्मसार होकर रामदेई का पति सजीवन बीमार होकर चल बसता है । इसके बाद अकेली रामदेई का संघर्ष की जीवटता मां ममता और मातृत्व की सार्थकता को साबित करती है।         
             
गांव से काम के लिए शहरी पलायन की त्रासदी को कहानी जीयो रे हरामी  में दर्शाया गया है कि घर के लिए सहारा बनने की ललक से मुबंई या एक बालक किस तरह समलैंगियों का शिकार बन जाता है और रोग के साथ घर वापसी के साथ ही परिवार की उम्मीदों और सपनों पर भी ग्रहण लग जाता है।  यह कहानी भी गरीब भारत के गरीब परिवार की पीड़ा को मार्मिक ढंग से पाठकों को अपने साथ ले जाती है। इस सच्चाई को भी बयान करती है कि गांव के लाखो बच्चे महानगर में किन हालातों  में रह रहे होते है। महुआ पट्टी कहानी में पुलिस ठेकेदार दारू औरत मार पीट दमन शोषण और मौत यानी उत्पीडन के सारे एटम बम मशाला मौजूद है। जिसको कथाकार भरत ने शोषण अन्याय की पूरी गाथा को इस तरह रखा है मानों गरीबों के लिए यह देश कितना असहज और असामन्य  सा है। विडम्बना है कि किसी भी गरीब भारत के किसी भी इलाके के लिए यह सामान्य सा मान लिया जाता है।

 संग्रह की सबसे रोचक रोमांचक और मोहक कहानी गुलाबी गैंग है। देखना यह होगा कि यदि फिल्म गुलाबी गैंग से पहले इस कहानी को लिखा गया है तो  इसके श्रेय से यह कहनी या कथाकार महरूम क्यों रह गया ? महिला शक्ति की कहनी में शोषण के खिलाफ उठ खड़ी होने वाली महिलाएं हमेशा ताकत देती है। कहानी प्रेरक और बुलंद हौसले को बयान करती है। 

 का गुरू कहानी  भी उल्लेखनीय है। शिक्षातंत्र में एय्याश गुरूजनों की पोल खोली गयी है। किस तरह शोधार्थी कन्याओं पर गुरूओं की नजर रहती है। किस तरह उन्हें बेबस कर कन्याओं को बिस्तर तक लाने के जोड़ तोड़ मे लगे एय्याश प्रोफेसर हर जगह दिखते और मिल जाते हैं। यह कहानी शिक्षा प्रणाली की विसंगतियों को सामने करती है। और माया महाठगिनी हम जानी भी शिक्षा जगत में प्रतिभा से ज्यादा चापलूस और चाटूकार छात्रों की दास्तान है कि किस तरह वे तिकड़म लगाकर  वे बुद्धिमान प्रतिभावान छात्रों पर भारी पड़ जाते है। शिक्षा जगत में गुरू घंटालों की कमजोरियों की कलई खोलने में लेखक पूरी तरह सफल रहे है। और अंत में 24 किलो का भूत कहानी में भारतीय जनमानस प्रतिबिम्बित होता है कि भूत प्रेत को लेकर जनमानस में व्याप्त भय अंधविश्वास को में सच क्या होता है। किस तरह एक रंगमंडली द्वारा या भूत प्रेत का चक्कर फैलाकर ग्रामीणों को ठगा जाता है। भूत प्रेत को लेकर आज भी बहुधा लोगों में एक अदृश्य शक्ति से घबराहट ब्याप्त है।  इसी को कथा का मुख्य आधार बनाया है। जिसमें  गरीबों ग्रामीमों और गरीब भारत की दशा दिशा और मन में ब्याप्त घोर डर को ही बखूबी उभारा है।
 भरत की कहनियों में ऐसा कुछ भी नहीं है जो एकदम मौलिक लगे।  खास यही बात इस किताब की सबसे बडी मौलिकता है कि सभी कहानियों के पात्र इंडिया या भारत के नहीं अपितु गरीब भारत से हैं जो रोजाना कदम कदम पर नाना तरह की विसंगतियों से जूझने और अत्याचर दमन सहने के लिए बाध्य और अभिशप्त है।

भरत प्रसाद की कहानियों को हिन्दी के तथाकथित आलोचक समीक्षक किस अदाज  में लेंगे यह तो उन महापुरूषों की मर्जी और मन पर निर्भर करता है की कहनी लेखन की इस नवीन शैली कथा प्रवाह को गतिमय करते हुए कहानी की धार को बढाने में मदद करते हैं या इस लोक शैला की धार को कुंद करके बेकार बना डालते है। युवा लेखक भरत प्रसाद की कहनियों की भाषा रसमय और बेहद दिलचस्प है। कहीं कहीं पर तो भाषा की रवानी और उसमें ठेठ देहाती शब्दों के प्रयोग से कहानियां अधिक सजीव निखरेपन के साथ मनभावन हो जाकी है।  कहानी में कई चैप्टर बना देने की यह नवीन शैली भी बहुतों को रास आएगा या नहीं यह खुदा ही जान सकते हैं पर कहानी को बोझिल और थकाउ बनाने की अपेक्षा शीर्षक खंड से अलग करने का यह कौशल भी पाठकों को मनभावन और कुछ अलग भी लग सकता हैं.।इससे कहानी में कोई अलगावा की बजाय रूचिकर  जुडाव सा  प्रतीत होता है। मैं तो कोई समीक्षक हूं नहीं मैं हमेशा एक पाठक की तरह ही किसी भी किताब को पढना आरंभ करता हूं और यह उस किताब में ताकत होनी चाहे कि वो मुझे अंत अंत बांधे रखे। ज्यादातर किताबें 50 से 100 पेज तक आते आते अपना दम तोड़ देती है और उस किताब को मैं अपने पास रखना भी नहीं चाहता.। अलबता कुछ किताबें मुझे दोबारा या कई बार भी पढने के लिए बाध्य कर देती है तो इसमें मेरी नहीं किताब की ताकत है कि वो मेरे दिमाग में घंटियों सी गूंजती रहती है। किसी भी तरह की किताब में वो गूंज ही उसकी ताकत और उसकी पठनीयता है। सामान्य पाठकों की कसौटी पर यह 24 नहीं 48 किलो का काफी वजनदार भूत है जिसको पढकर खारिज करना संभव नहीं है। इसकी कहनियां पाठकों से संवाद करेगी और मन में गूंजती रहेगी।यही भरत प्रसाद की कहानियों की सबसे बडी ताकत है कि वह पाठकों को पढने का हौसला देती है।

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