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बिहार झारखंड के कालाहांडी समान पलामू की कथा व्यथा धपेल

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नवंबर 19, 2013



वाड्.मय : जुलाई 2013 के आदिवासी विशेषांक- 1 में श्याम बिहारी श्यामल के राजकमल प्रकाशन से वर्ष 1998 में छपे महत्वपूर्ण उपन्यास धपेल पर डा. दया दीक्षित का एक आलेख प्रकाशित हुआ है। आईये पढ़ते हैं यह आलेख 'जंगल की गुहार : धपेल'

दया दीक्षित

    श्याम बिहारी श्यामल का उपन्यास ‘धपेल’ पढ़ने के बाद याद आता है उत्तरांचल के कृतिकार विद्यासागर नौटियाल का उपन्यास ‘मेरा जामक वापस दो’। विद्यासागर नौटियाल ‘जामक वापसी’ के जरिये पिछले पन्ने के लोगों या पृष्ठभूमि के लोगों की आवाज़ बनकर फ़रियाद करते हैं देश के लोकतंत्रा की वापसी’ की। अजीब इसलिये नहीं लगेगी लोकतंत्र में लोकतंत्र की वापसी’ की फरियाद, क्योंकि कुछ ‘घरानों’ की घेरेबंदी की गिरफ्त में फँसे हम सब, इस अलोकतांत्रिक शासनिक षड्यंत्र से मुक्त होना चाहते हैं! लोकतंत्र किस तरह से अलोकतंत्र में तब्दील हो रहा है, किस तरह से विचारधाराएँ मर रही हैं, किस तरह से वास्तविक नेतृत्वकर्ता भुखमरी की कगार पर अंतिम सांसे ले रहे हैं, इस सबका आँखों देखा- सा हाल मिलता है-‘धपेल’ उपन्यास में!

उपन्यास का शीर्षक ‘धपेल’ प्रतीक है मनुष्य की ‘हवस’…